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चाणक्य नीति PDF DOWNLOAD

नीति श्लोक
काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम् ।

व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा।।
देवो रुष्टे गुरुस्त्राता गुरो रुष्टे न कश्चन:।

गुरुस्त्राता गुरुस्त्राता गुरुस्त्राता न संशयः।।

वाणी रसवती यस्य,यस्य श्रमवती क्रिया ।

लक्ष्मी: दानवती यस्य,सफलं तस्य जीवितम् ।।

सेवितव्यो महावृक्ष: फ़लच्छाया समन्वित:।

यदि दैवाद् फलं नास्ति,छाया केन निवार्यते।।

हस्तस्य भूषणम् दानम् , सत्यं कण्ठस्य भूषणम् ।

श्रोतस्य भूषणं शास्त्रं ,भूषणै: किं प्रयोजनम् ।।

न कश्चित् कस्यचित् मित्रं न कश्चित् कस्यचित् रिपु:

न विना परवादेन रमते दुर्जनो जन:।

काक:सर्वरसान् भुङ्क्ते विना मध्यं न तृप्यति।।